आज़ फ़िर बरसात आयी है .
आयी है मग़र चुपके से. ना कोई संदेशा , ना कोई ख़बर . पहले भी तो आती थी मग़र अंदेशा होता था . वो टप टपाहट की धुन पर नाचती बूँदों का उत्सव क्यों बंद है . वो सुर्ख़ मिट्टी से बूँदों का मिलना और उस मिलन की सौंधी खुशबू कहाँ गुम हुई . वो कागज़ की कश्तियों का लंगर कौन लूट ले गया . वो झँझावात , वो हवाओं की सनसनाहट किधर है .बारिश में भींगते नहाते वो मंज़र क्यूँ नहीँ दिखते. टिन की छत पर थिरकते बूँदों का वो सँगीत अब शाँत क्यूँ है .घर की दीवारों को गीला कर देने वाला वो लगातार रिसने वाला मौसम क्यूँ नहीँ आता .बूढ़ा बरगद का वो पेड़ क्यूँ वीराँ पड़ा है . कहाँ गया उनपर कलरव करते पंछियों का वो रेला . कहाँ गया उन बच्चोँ का मेला जो उनकी छाँव में हर रोज़ लगता . उन बादलोँ के गरजने से पहले अपनी कानों पे सबसे पहले ऊँगलियोँ रखने का वो खेल भी क्यूँ बंद पड़ा है .वो अपनी ही धुन में टर्राते मेंढक अब कहाँ चले गये . कहाँ गये वो टोटके जिनसे बारिश रोकी जाती थी . मुहल्लों में घुटनों भर लगने वाला वो पानी जिसपर हमने छप -छपाहट का खेल खेला , कहाँ गुम हुआ वो .दिन को भी वो रात का मंज़र अब दिखता नहीँ . नहीँ दिखता बारिश का वो उत्सव . अब तो सीधे बाढ़ आती है , बूँदों का वो दौर अब गुज़र चला है . अब वो सारी धुन , वो भीनी महक और जज़्बात बंद कमरे की दीवारों में कैद है . अब ये नया दौर आया है . (RD)✍✍✍
आयी है मग़र चुपके से. ना कोई संदेशा , ना कोई ख़बर . पहले भी तो आती थी मग़र अंदेशा होता था . वो टप टपाहट की धुन पर नाचती बूँदों का उत्सव क्यों बंद है . वो सुर्ख़ मिट्टी से बूँदों का मिलना और उस मिलन की सौंधी खुशबू कहाँ गुम हुई . वो कागज़ की कश्तियों का लंगर कौन लूट ले गया . वो झँझावात , वो हवाओं की सनसनाहट किधर है .बारिश में भींगते नहाते वो मंज़र क्यूँ नहीँ दिखते. टिन की छत पर थिरकते बूँदों का वो सँगीत अब शाँत क्यूँ है .घर की दीवारों को गीला कर देने वाला वो लगातार रिसने वाला मौसम क्यूँ नहीँ आता .बूढ़ा बरगद का वो पेड़ क्यूँ वीराँ पड़ा है . कहाँ गया उनपर कलरव करते पंछियों का वो रेला . कहाँ गया उन बच्चोँ का मेला जो उनकी छाँव में हर रोज़ लगता . उन बादलोँ के गरजने से पहले अपनी कानों पे सबसे पहले ऊँगलियोँ रखने का वो खेल भी क्यूँ बंद पड़ा है .वो अपनी ही धुन में टर्राते मेंढक अब कहाँ चले गये . कहाँ गये वो टोटके जिनसे बारिश रोकी जाती थी . मुहल्लों में घुटनों भर लगने वाला वो पानी जिसपर हमने छप -छपाहट का खेल खेला , कहाँ गुम हुआ वो .दिन को भी वो रात का मंज़र अब दिखता नहीँ . नहीँ दिखता बारिश का वो उत्सव . अब तो सीधे बाढ़ आती है , बूँदों का वो दौर अब गुज़र चला है . अब वो सारी धुन , वो भीनी महक और जज़्बात बंद कमरे की दीवारों में कैद है . अब ये नया दौर आया है . (RD)✍✍✍
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