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Tuesday, 29 July 2014

अपनापन


 अपनापन

 

छोटी-छोटी खुशियों में,जीवन पूरा लगता था

ममता की आँचल में, मन शीतल सा लगता था

मंज़र-मंज़र गाँव का, बस अपना सा लगता था

मिलना सारे यारों का, एक मेला सा लगता था

हर मौसम सुहाना, अलबेला सा लगता था

खेल-खेल में बच्चों के, एक झगड़ा सा लगता था

बस दूजे ही पल, सब अपना सा लगता था

मोल-भाव का पता नहीं था, मिट्टी भी सोना सा लगता था

मिट्टी के चन्द खिलौने से, शहर अलबेला सा सजता था

धूल भरे उन मुखड़ों मे भी, राजकुमार सा लगता था

छोटी-छोटी खुशियों मे, जीवन पूरा लगता था

ममता की उस छाँव मे, प्रेम अविरल सा बहता था

धूल भरे उस गाँव  में, फिर भी दिल सा लगता था

बैर नही था कभी किसी से, सब अपना सा लगता था

मंज़र-मंज़र गाँव का, बस अपना सा लगता था

 

                                                             -राजू दत्ता

मूल्य


मूल्य

 

नारी-शक्ति की महिमा का पाठ पूरे संसार को पढ़ाने वाला भारतवर्ष आज स्वंय से आँखें चुरता नज़र रहा है. शक्ति-पीठों की पूजा-अर्चना करनेवाला एक उन्नत समाज आज नारी-जाति के मान-मर्दन से कलंकित होता जा रहा है. विकास की पराकाष्ठा को चूमने का दावा करनेवाला समाज स्वंय से द्वन्द करता दिख रहा है. भौतिक विकास की दौड़ मे हमारा सामाजिक विकास पिछर सा गया है. सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ानेवाला पाठ्यकर्म अब केवल भौतिक मूल्यों का सबक सिखाने की ओर अग्रसर है. भौतिकता की दौड़ मे मानव भाव सिमटा जा रहा है. परिवार का दायित्य अब केवालमात्र भौतिक सुविधाएँ प्रदान करना ही रह गया है. मानव-मूल्य, संस्कार आदि का पाठ तो परिवार का दायित्य रहा है और ही हमारे शिक्षण-संस्थान का. फिर यह समाज क्या अपेक्षा रख सकता है ? जो बीज मे ही नहीं है, वो वृक्ष और फिर फल में कैसे हो सकता है ? नारी-जाति का अपमान विध्वंश होते समाज का स्पष्ट संकेत है. नारी-शक्ति का मान-मर्दन विरूपित और कलुषित समाज को काल के गर्त मे ले जाती है. इतिहास साक्षी है.

-राजू दत्ता

सुकून


              सुकून

अंधेरों में भी उम्मीदों का चिराग जलाकर तो देखो
 
रोशन होगा घर तेरा भी, दीया किसी का जलाकर तो देखो
 
सवरेंगी जिंदगी तुम्हारी भी, घर ग़रीबों का सजाकर तो देखो
 
होगी निजात ठोकरों से तुम्हारी भी, सहारा किसी को देकर तो देखो

 

गमों का दौर भी गुजर जाएगा, आँसू किसी का पोछ्कर तो देखो

टूट जाएगा वहम ग़रीबी का भी तेरा, किसी भूखे को खिलाकर तो देखो

मिलेगा सुकून दिल को तुम्हारे भी, दर्द किसी का मिटाकर तो देखो

मेल तेरा भी हो जाएगा, किसी को मिलकर तो देखो

 

मंज़िलें मिल जाएँगी तुम्हें भी, रास्ता किसी को बताकर तो देखो

सजेगी सेज तुम्हारी भी, डोली किसी की सजाकर तो देखो

लगेंगे पराए भी अपने, किसी को गले लगाकर तो देखो

सजेगी मुस्कान चेहरे पे तुम्हारे भी, किसी को हँसाकर तो देखो

 

आएगा लौट बचपन तेरा भी, किसी बच्चे को बहलकर तो देखो

होगा अहसास अमीरी का भी, बाँटकर बच्चों मे खिलोने तो देखो

आएगी नींद गहरी तुम्हें भी, सोकर गोद मे माँ के तो देखो

पाएगा सुकून तू भी, छाँव  मे आँचल की के तो देखो

 
                                                                         -राजू दत्ता

“वक़्त”


“वक़्त”

रोशनी शहर का यूँ कमाल कर गया
आदमी तो जिंदी है, इंसानियत जला गया.
रौनक--जिंदगी, यूँ बढ़ा ले गया
चैन--सुकून, सब चुरा ले गया.
 

वक़्त का जहाज़, यूँ उड़ा ले गया

उन हसीं लम्हों को, यूँ चुरा ले गया

जिंदगी का दौड़ हमसे, वक़्त छीन ले गया

फ़ासले रिश्तों का, यूँ बढ़ा ले गया.

 

संग बैठने के यारों का, वो समा ले गया

जिंदगी का दौड़ भी, क्या हमें दे गया

रोशनी शहर का, यूँ हिसाब कर गया

रोशन जमाना हुआ, घर अंधेर कर गया.

 

शहर--मिज़ाज भी, यूँ सबक दे गया

पत्थरों की महफ़िलों में, गॉव याद गया

रोशनी शहर का, यूँ कमाल कर गया

आदमी तो जिंदा है, इंसानियत जला गया.

 

                        -राजू दत्ता

Monday, 21 July 2014

“यादें”


“यादें”

भूले से भी भुला ना सके उन यादों को

दीए की रोशनी मे गुज़री उन रातों को

नुक्कर की दुकान वाली नानी की उन बातों को

पारी-कथाओं मे छिपे उन जज्बातों को

बारिश मे रिसने वाले खप्पर की उन हालातों को

तूफ़ानों मे भी मिलने वाले उन मुलाक़ातों को

मधुर मिलन की उन सौगातों को

भूले से भी ना भुला सके उन यादों को

दीए की रोशनी मे गुज़री उन रातों को.

-राजू दत्ता