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Sunday, 26 August 2018

ज़ायका

वो जलेबियों की महक ,  रफ़ी के आजादी के गाने , वो 15 ऑगस्ट की तड़के की सुबह और सुबह के इँतज़ार में बीती शाम .......आज़ादी का मतलब पता नहीँ था मग़र पूरे आज़ाद थे .
सुबह तड़के उठ जाना और इस्त्री की हुई कमीज़ और हाफ़ पैंट नहाकर तुरत पहन कर पुराने जूतों को ढुंढवाने की जिद्द ज़ेहन में जिंदा है . जल्दी से राष्ट्रगान ख़त्म होने का इँतज़ार उन रसदार जलेबियों के ज़ायका लेने का . आज़ादी का मतलब पता न था मग़र आज़ाद थे . उन जलेबियों का रस अभी भी ताज़ा है ज़ेहन में . बंद आँखोँ से साफ़ दिखती वो पुरानी तस्वीर कभी धुँधली ना हुई . आज़ फ़िर आज़ादी का जश्न -ए -माहौल है और आज़ादी का मतलब बहुत पता है मग़र वो आज़ादी का लुफ़्त क्यों नहीँ है ?
अब जलेबियों का ज़ायका भी बदला बदला सा है . खुशबुओं का मिजाज़ भी अलग सा है . वो आज़ादी की खुशबू अब कहीँ खोयी सी है .अब वो पुरानी जिद्द क्यों नहीँ आती ,  क्यों नहीँ इँतज़ार रहता उन बेशक़ीमती खजानों का जो माँ के आँचल के कोर से बँधी चवन्नी ख़रीद लेती थी ? (RD)✍✍✍

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