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Sunday, 26 August 2018

ट्रेन टू कोटा

ट्रेन टू कोटा :

बारहवां का परीछा भी हो गया है . दशमां फर्स्ट डिविजन किए थे सो साइन्स लेकर फर्स्ट डिविजन क़ो पूरा इज्ज़त बख्शे थे . सब परीछा जबरदस्त गया था . अंग्रेजी का पेपर भी ठीके गया था . दू -तीन महीना रिज़ल्ट आते आते लग जाएगा . पिताजी कहे हैं कि रैपिडेस्क इंगलिश का क़िताब लेकर प्रेक्टीस करो और स्पोकेन इंग्लीश का किलास शुरू कर दो . अंगरेजी नहीं आवेगा तो कौनो नहीं पूछेगा . साइन्स हिंदी में पढ़ना औरो आर्ट्स लेना एक्के है . सब गुर गोबर हो जाएगा .अंगरेजी पर जोर जादा है . पिताजी कहते हैं फ़लाना का लइकन धरा -धर अंगरेजी बोलता है . बारहवां कौनो तरह अँगरेजी में  पढ़ लिए मगर कॉन्फिडेन्स ठीक से नहीं हुआ . इधर पटना में अन्गेरेजी भी हिंदी में पढ़ाता है .इसीलिए अँगरेजी मन के अंदरे रह गया है और बाहर निकलते समय मन हदियाने लगता है . गोर कांपने लगता है . इधर बार बार अंगरेजी टोन पर बिहारी तड़का ना चाहने पर भी लग ही जाता है . पता चला फोनेटिक ही खराब है . सो ब्रिटिश लिंगवा जॉइन कर लिए हैं. पिताजी का जोर है की हम हू कोटा चले जाएँ काहे कि पटना का माहौल अब उनको ठीक नहीं लग रहा और उपर से पानी ख़राब है . दू साल में अंगरेजी भी ठीक से नहीं बोल पाने का दर्द पिताजी की बातों में बार बार दिखता है और फ़िर कोटा में फुल इंग्लीश में पढ़ाई होता है . इधर दू साल में तीन बार जॉनडिस हो गया था और शरीर का नक्शा भी खराब होले था , जिंदगी का रूप रंग बदल गिया था . पिरूकिया कम और चंदरकला जादा खाने लगे थे . लिट्टी चोखा का तड़का अब बिना सुट्टा के सुहाता नहीं था . तीन महीना ख़तम हुआ और बारहवाँ का रिज़ल्ट आया और एक बार फ़िर मम्मी का टोटका और हमरा किसमत हमको फ़िर से फर्स्ट डिविजन करवाया . पिछली बार के जैसा इस बार भी नॉलेज कम औरो नंबर जादा आया . अभी तक ई समझ नहीं आया कि ग्यारहवां और बारहवाँ का पढ़ाई और आईआईटी का पढ़ाई अलग अलग काहे है . असली खेल तो अब शुरू होने वाला है . घर में सब बहुत खुश है . फर्स्ट करना मतलब घरवाला का गर्दन उपर करना ही तो है भले भी अपना गरदन लटक जाए . खैर अब पटना का लिट्टी चोखा , चंदरकला औरो बेसन का लड्डू से बिदा लेने का टैम आ गया है . सब दोस्त लोगन समान पैक करने आए हैं . रात क़ो सबका रुकने का प्रोग्राम हुआ है . कोटा का मॉल औरो कोचिंग का चर्चा रातभर चलता रहा . रातभर खैनी , सुट्टा और चाय चलता रहा . मकान मलिक क़ो एक बार पता चल गया था कि दारू चला था सो हाथ पैर जोर कर माफ़ी मांगे थे कि आगे से नहीं होगा .उसका अहसान अभी तक पैर छूकर चुकाते आ रहे हैं . बीयर दारू नहीं होता यह ज्ञान हमको हो गया था मगर मकान मालिक क़ो इसका ज्ञान नहीं था . खैर रात ख़तम और भोरे भोर मकान मालिक का पैर छूकर ऑटो लेकर स्टेशन क़ो निकल पड़े . हनुमान मंदिर में गोर लगे और मम्मी का गछा बेसन का सवा किलो लड्डू चढ़ाए . मुस्सलम्पुर हाट , बाज़ार समिति , फ़िज़िक्स , कैमिस्ट्री , मैथ्स सब छूटले  जा रहा था . ट्रेन राजिंदर नगर टर्मिनल से गुज़रते जा रही थी और धीरे धीरे धुंधला होते जा रहा था . इधर मम्मी पिरूकिया और ठेकुआ बना रही है . इधर छोटका बार बार पटना के बारे में पूछ रहा था . इधर वकील चाचा अंगरेजी में पूछ रहे थे -"What is your ambition in life ? " .  गांव के दोस्त लोग बार बार मिलने आ रहा है . भोलूआ जो कभी खेलाता नहीं था अब बार बार बुलाता है . एक सप्ता बीत गया और कोटा का वेटिंग टिकट अब कन्फर्म हो गया है . अबकी बार गांव का कम औरो मुस्सलम पुर हाट ,  राजिंदर नगर और बाजार समिति का याद जोर मार रहा है . मम्मी फ़िर पिछल्के बार जैसन रोले जा रही थी और बार बार अचरा से लोर पोछे जा रही थी . सामानों सब पैक हो गया था . हमरो मन रोए जा रहा था . मम्मी बार बार केतारी का रस पीने का किरिया दिए जा रही थी . बार बार बोले जा रही थी इस बार जौण्डिस मत करना ,  बेसी बाहर का नहीं खाना ,  रात क़ो बेसी देर जगना मत , भोरे सत्तू पीना , मैगी टैगी मत खाना . पिछली बार के जैसा '  हूँ हूँ '  ' ठीक है '  करले जा रहे हैं . अबकी जाने का कौनो खुशी नहीं हो रहा मन में . ट्रेन का टैम हो गया है . सबको गोर लग लिए . पहले गोसाई क़ो गोर लगना नहीं भूले . मम्मी फ़िर अंचरा से हजरका नोट निकलकर चुपके से रख दी है . कही है पनसैया का जींस लेना औरो बाकी केतारी का रस पीते रहना . मम्मी टीसन  तक बीच बीच में रोते रही . पिताजी बार बार समझा रहे हैं जादा मॉल उल मत जाना ,  संगी साथी के चक्कर में बेसी मत परना , फिलिम तीलीम जादा मत देखना ,  एक बार आईआईटी निकाल लो फ़िर जो मर्जी करना . ट्रेन खुल रही है . अबकी पहला वाला मज़ा नहीं आ रहा था . मन हदस रहा था . बस बहे जा रहे थे . असली कांड अब होने जा रहा था . (RD)✍🏻✍🏻✍🏻

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