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Sunday, 26 October 2014

संस्कार


हार


 

एक परिवार था. वहाँ संस्कार और संवेदना दो भाई-बहन रहा करते थे. धर्म और नीति उनके माता-पिता थे. परिवार उन्नति की ओर था. समृद्धि कदम चूम रही थी. जब समृद्धि आई तो धर्म और नीति दोनों माता-पिता उसकी आवभगत में वयस्त होते चले गये. समृद्धि इतनी आकर्षक ही थी कि कोई भी उसमे खो जाए. संस्कार और संवेदना दोनों भाई-अह्नों पर अब धर्म और नीति का ध्यान ही नहीं रहता था. संस्कार और संवेदना उदास रहने लगे. धर्म के भाई विचार ने जब ये देखा तो उन्होनें धर्म और नीति को समृद्धि के वश से बाहर आने को बार-बार कहा. परंतु वयर्थ. समृद्धि ने धर्म और नीति से विचार का अलगाव करने के लिए उसपर चोट करनी शुरू कर दी. विचार घायल होता रहा और अंत में कमजोर होकर मृत हो गया. विचार अब मर चुका था. संस्कार और संवेदना अब और भी अकेले हो गये. विचार ने कई बार स्वप्न मे आकर भी धर्म और नीति को समझाने का प्रयत्न किया परंतु समृद्धि की मोह-पाश में धर्म और नीति जकड़ते चले गये. धर्म और नीति के वत्सल्य से वंचित संस्कार और संवेदना अनाथ हो गये. समृद्धि को संस्कार और संवेदना से घृणा थी. समृद्धि ने एक दिन दोनों का गला घोंट दिया. संस्कार और संवेदना मर चुकी थी. धर्म और नीति की निद्रा टूटी और अश्रु-धारा बहने लगी. अपार दुख की घड़ी आई. विचार फिर आया एक दिन स्वप्न में. समृद्धि के षड्यंत्र का पर्दाफाश हो चुका था. धर्म और नीति ने सम्रिधि को त्याग दिया. धर्म और नीति संस्कार और संवेदना खोकर मृत-प्राय हो गये. समृद्धि अब नये घर की तलाश मे है.

                                                                                                                                                                  -राजू दत्ता

 

Tuesday, 5 August 2014

अपराजित हार


अपराजित हार

ये कैसी जीत है कि हम जहाँ खड़े हैं, वहाँ तलाश है उनकी जो पीछे छूट गये ? हर जीत में इंसान अकेला खड़ा होता है. रेस मे जीतने वाला विजेता तो कहलाता है, मगर हार मे मिलती हैं उनकी यादें जो दौड़ में पीछे छूट गये. जिंदगी की दौड़ भी कुछऐसी ही है. सपनों की उड़ान में आशियाने छूट जाया करते हैं. किसी चीज़ को पाने की कीमत किसी चीज़ को खोकर मिलती है. शायद इसलिए सबकुछ पाकर भी अधूरेपन का अहसास होता है. जवानी बचपन को खो देती है. समझदारी आने पर यौवन चला जाता है. जीवन के अंतिम पड़ाव में हमें यथार्थ से साक्षात्कार होता है. यह सुनिश्चित हो जाता है  कि हमारी दिशाहीन दौड़ निरर्थक थी. एक जीत ऐसी भी है, जहाँ विजेता केवल जीतता है. एक जीत ऐसी भी है, जहाँ हार में भी जीत का जश्न होता है. हारकर जीतने का वह सुखद अनुभव उस जीत से भी बड़ा होता है. सबको साथ लेकर चलने में चाल भले ही मन्थर हो जाती है और प्रथम दृष्तिया दुनिया की दौड़ में खुद को पीछे पाते हैं, परंतु साथ चलने का जो विजय-भाव होता है, वह जीतने की महत्वाकांक्षा को पराजित कर देता है. यह अंतरात्मा की जीत है.

  -राजू दत्ता

 

Tuesday, 29 July 2014

अपनापन


 अपनापन

 

छोटी-छोटी खुशियों में,जीवन पूरा लगता था

ममता की आँचल में, मन शीतल सा लगता था

मंज़र-मंज़र गाँव का, बस अपना सा लगता था

मिलना सारे यारों का, एक मेला सा लगता था

हर मौसम सुहाना, अलबेला सा लगता था

खेल-खेल में बच्चों के, एक झगड़ा सा लगता था

बस दूजे ही पल, सब अपना सा लगता था

मोल-भाव का पता नहीं था, मिट्टी भी सोना सा लगता था

मिट्टी के चन्द खिलौने से, शहर अलबेला सा सजता था

धूल भरे उन मुखड़ों मे भी, राजकुमार सा लगता था

छोटी-छोटी खुशियों मे, जीवन पूरा लगता था

ममता की उस छाँव मे, प्रेम अविरल सा बहता था

धूल भरे उस गाँव  में, फिर भी दिल सा लगता था

बैर नही था कभी किसी से, सब अपना सा लगता था

मंज़र-मंज़र गाँव का, बस अपना सा लगता था

 

                                                             -राजू दत्ता

मूल्य


मूल्य

 

नारी-शक्ति की महिमा का पाठ पूरे संसार को पढ़ाने वाला भारतवर्ष आज स्वंय से आँखें चुरता नज़र रहा है. शक्ति-पीठों की पूजा-अर्चना करनेवाला एक उन्नत समाज आज नारी-जाति के मान-मर्दन से कलंकित होता जा रहा है. विकास की पराकाष्ठा को चूमने का दावा करनेवाला समाज स्वंय से द्वन्द करता दिख रहा है. भौतिक विकास की दौड़ मे हमारा सामाजिक विकास पिछर सा गया है. सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ानेवाला पाठ्यकर्म अब केवल भौतिक मूल्यों का सबक सिखाने की ओर अग्रसर है. भौतिकता की दौड़ मे मानव भाव सिमटा जा रहा है. परिवार का दायित्य अब केवालमात्र भौतिक सुविधाएँ प्रदान करना ही रह गया है. मानव-मूल्य, संस्कार आदि का पाठ तो परिवार का दायित्य रहा है और ही हमारे शिक्षण-संस्थान का. फिर यह समाज क्या अपेक्षा रख सकता है ? जो बीज मे ही नहीं है, वो वृक्ष और फिर फल में कैसे हो सकता है ? नारी-जाति का अपमान विध्वंश होते समाज का स्पष्ट संकेत है. नारी-शक्ति का मान-मर्दन विरूपित और कलुषित समाज को काल के गर्त मे ले जाती है. इतिहास साक्षी है.

-राजू दत्ता